President's Message

President

 

 

 

शिक्षा का उद्देष्य मनुष्य का आरोहण है। आरोहण तमस् से ज्योति की ओर वेद का संदेश है “उद्यानमृते पुरूष नावयानम्“ । वेद मानव को आह्वान करते हुए संदेश देता है “अमृत के पुत्रों! सुनो, तुम्हें उध्र्वगामी बनना है, अवरोहण नहीं करना है।“ वैदिक संस्कृति में शिक्षा का उद्देष्य मृत्यु की नदी को पार करके अमरत्व को प्राप्त करना है। जन्मना सब शूद्र होते हैं परन्तु शिक्षा के माध्यम से मुनष्य पशुत्व से मुक्ति प्राप्त करता हुआ मानव बनता है और मानव से देवता बनता है। इसलिए कबीर ने गुरू का नमन करते हुए कहा-“जिन मनुष्य ते देवता करत न लागहिं बार“ इस प्रकार शिक्षा का उद्देष्य देवत्व की प्राप्ति है परन्तु आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने मानव जाति को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली भोगवाद को ही जीवन का लक्ष्य मानती है और योग्यतम के विजय के सिद्वान्त का प्रतिपादन करती है। यह आसुरी शिक्षा है। वैदिक शिक्षा आत्म विकास, मानसिक विकास और “इंद न मम्“ (अर्थात् मेरा कुछ नहीं है। सब कुछ समाज का है) आदि उदात्त्त विचारों का प्रतिपादन करती है। “इंद मम् एवं न मम्“ का संघर्ष चल रहा है। वैदिक शिक्षा प्रणाली विषयों की पूर्ति को ही मनुष्य का लक्ष्य मानती है। महर्षि दयानन्द ने वैदिक शिक्षा प्रणाली का दिग्दर्शन कर विश्व को ऊध्र्वगामी बनाने का पथ प्रशस्त किया । हम उस मार्ग पर नहीं चल रहे इसलिए आत्मकेन्द्रित मानव ने मत्स्य न्याय का विश्व को प्रेरित नहीं करेंगे तब तक विश्व में आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक शांति नहीं हो सकती। आर्य समाज के आदर्शों से अनुप्राणित शिक्षण संस्थाओं में नयी पीढ़ी को हम प्रेय एवं श्रेय मार्ग का पथिक बनाना चाहते हैं जहाँ त्याग है, समर्पण है, बलिदान है, सहृदयता है, सामंजस्य भाव है, अद्वैष है, प्रेम है, स्नेह है, संवेदना है, सहानुभूति है, परोपकार है। ईश्वर हमें शक्ति दे कि मानव समाज की नयी पीढ़ी इन उदात्त आदर्शों से प्रेरित होकर नारकीय अग्नि में जलते हुए संसार को स्वर्ग बना सके।

सत्यव्रत सामवेदी